Friday, January 16, 2015

हानेके और उनकी फिल्में :

हानेके इस समय मुझे पश्चिमी दुनिया के सबसे प्रतिभाशाली फिल्म निर्देशक लगते हैं। प्रखर बुद्धिजीवी और दृश्य माध्यम को गहराई से समझने वाले और उसका भरपूर इस्तेमाल करने वाले फ़िल्मकार। सन 2012 में वे फिल्म 'अमोर' से अधिक चर्चा में आ गए लेकिन उनकी किसी भी फिल्म को इससे कमतर नहीं कहा जा सकता। अपनी फिल्मों में वे बहुत साधारण विषयों को उठाते हैं मगर उनका मन्तव्य पश्चिमी समाज में व्याप्त असंतोष, बेचैनी और बिखराव की कहानी कहना होता है। एक नज़र में उनकी फिल्में व्यक्तिगत जीवन की सामान्य कहानियाँ लगती हैं मगर वे आपको भीतर तक दहला देती हैं। हिंसा या हत्या उनकी फिल्मों का स्थायी भाव है लेकिन एकाध फिल्म को छोडकर उनकी अन्य फिल्मों में रक्तरंजित और क्रूर गैंग-वार, खूनखराबा, बंदूकें या छुरेबाजी नहीं है, जैसा कि कई प्रसिद्ध पश्चिमी निर्देशकों की, खासकर हॉलीवुड के निर्देशकों की फिल्मों में देखने को मिलता है और न ही कोई हीरोपंती है। अधिकतर फिल्मों में मुख्य पात्र दयनीय मृत्यु के शिकार होते हैं या दर्दनाक मृत्यु का साक्षात्कार करते हैं। 
फिल्म, टीवी और मीडिया पर हानेके के साक्षात्कारों से यू ट्यूब भरा पड़ा है, जिनमें वे समाज, राजनीति और जीवन के सभी पहलुओं पर मीडिया के प्रभाव पर महत्वपूर्ण चर्चा करते हैं। एक इंटरव्यू में वे कहते हैं: “हम मीडिया में दिखाए जा रहे यथार्थ को यथार्थ मानकर चलते हैं मगर वास्तव में वह यथार्थ नहीं होता बल्कि यथार्थ का चित्र या यथार्थ का वीडियो होता है। जब हम टीवी पर आ रहे समाचारों को सच मानने लगते हैं तो दरअसल अपनी समझ को भोथरा कर रहे होते हैं। दरअसल वह यथार्थ नहीं होता बल्कि वास्तविक छवियों के बहाने दिखाया जाने वाला झूठ होता है।” जब हम कहते हैं कि मृत्यु या बलात्कार के समाचार अब हमें पहले की तरह नहीं झँझोड़ते, तो शायद इसका कारण यही होता होगा।
सत्य को कहने में हानेके महज तटस्थ नहीं बल्कि बेहद क्रूर हैं। किसी भी फिल्म में व्यर्थ भावुकता का नामोनिशान नहीं है। कई बार लगता है कि हानेके के पात्रों में संवेदनशीलता का अभाव है। संभव है यह पश्चिमी समाज की आज की परिस्थिति से उपजी उदासीनता का प्रतिबिंब हो। हम एशियाइयों के लिए यह समझना मुश्किल होगा कि आखिर यह उदासीनता, असंतोष और निराशा पश्चिमी समाज में क्योंकर है। कुछ फिल्मों में हानेके यह बताने का प्रयास करते हैं कि वह समाज प्रगति और सुख-संतुष्टि के ऐसे दौर में प्रवेश कर चुका है जहाँ आगे उनके करने के लिए कुछ नहीं है, कोई खास संघर्ष नहीं है, सिवा इसके कि अपनी इस सुरक्षित आरामगाह को दुनिया के भूखे नंगे लोगों से बचाकर रखा जाए, और इसलिए उनके जीवन में व्यर्थता बोध भर गया है। 
हानेके की फिल्में बहुत धीमी गति से चलती हैं लेकिन उनमें एक तरह के पेसिव आतंक का ऐसा सम्मोहन है कि आप उसके एक फ्रेम को भी मिस करना नहीं चाहेंगे, बार-बार रिवाइंड करके देखना चाहेंगे, जैसे कुछ छूट गया हो। कई बार महसूस होता है उनकी फिल्मों के कई फ़लक हैं। आप उनकी फिल्में एक बार देखकर संतुष्ट नहीं होंगे, बार-बार देखना चाहेंगे और हर बार वह आपको नई लगेंगी, हर बार एक दूसरा फ़लक खुलता नज़र आएगा। 
दुर्भाग्य से हानेके की एक भी फिल्म न सिर्फ हिन्दी में डब नहीं की गई है बल्कि किसी भी फिल्म के सबटाइटल हिन्दी में उपलब्ध नहीं हैं। यह एक बड़ा काम है, जिसे फिल्म प्रेमियों को करना चाहिए। मैंने भी अभी उनकी कुछ फिल्में नहीं देखी हैं। हानेके से परिचय करवाने के लिए अरविंद Ar Vind का शुक्रिया अदा करना चाहता हूँ। शुरू की कुछ फिल्में अशोक गुप्ता Ashok Gupta से मुझे प्राप्त हुईं, उनका भी शुक्रिया। 

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