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Tuesday, January 27, 2015

हानेके और उनकी फिल्में : (2) द सेवन्थ कोंटिनेंट

द सेवन्थ कोंटिनेंट 

हानेके ने अपने एक इंटरव्यू में कहा है कि उनकी फिल्में ऐसी हैं, जिन्हें बनाना आसान है लेकिन देखना कठिन। “मैं सेट पर हँसी-मज़ाक करता रहता हूँ, निर्माण प्रक्रिया के साथ बहुत अंतरंग नहीं होता और माहौल को हल्का-फुल्का बनाए रखता हूँ।... मैं अपेक्षा करता हूँ कि फिल्म निर्माण के दौरान सभी कलाकार उसके सृजन का आनंद लेंगे लेकिन (चाहता हूँ कि) देखने वाले उनसे विचलित हों, ठगा-सा महसूस करें, यहाँ तककि बहुत अवसादग्रस्त हो जाएँ।” वे लंबे-लंबे मामूली रूटीन दृश्यों से ऐसे आतंक का माहौल रचते हैं कि दर्शक चाहता है, जल्द से जल्द दृश्य समाप्त हो जाए मगर पल भर के लिए भी स्क्रीन से आँख नहीं हटा पाता।

सरसरी तौर पर फिल्म ‘द सेवन्थ कोंटिनेंट’ पति, पत्नी और एक मासूम सी बेटी वाले बहुत सुखी परिवार की कहानी लग सकती है मगर सब कुछ उपलब्ध होने के बावजूद वे सभी एक बेहद नीरस जीवन जी रहे हैं। फिल्म की शुरुआत ही एक घुटन भरे, बोझिल दृश्य से शुरू होती है, जिसमें एक अंधेरे गैराज में कार धुल रही है और परिवार के तीनों सदस्य कार के अंदर बंद हैं। यह दृश्य साढ़े तीन-चार मिनट लंबा है और पहले कार पर तेज़ पानी की बौछार, फिर बड़े से पोछे (मॉप) से उसे साफ किए जाने का दृश्य विस्तार से फिल्माया गया है जबकि अंदर बंद तीनों पात्र अपने भावहीन चेहरे लिए चुपचाप बैठे हैं जोकि इंतज़ार के ऐसे मौकों पर सामान्य ही कहा जाएगा। मगर भूमिका के रूप में दृश्य अपना काम कर जाता है। और जब कार गैराज से बाहर निकलती है तो पूरे स्क्रीन पर आस्ट्रेलिया के उन्मुक्त समुद्री किनारे का दृश्य दिखाई देता है।

फिल्म तीन हिस्सों में विभक्त है, जिनमें 1987, 1988 और 1989 के कुछ दिनों की दिनचर्या को फिल्माया गया है। पहले दो हिस्सों में पात्रों का सामान्य रूटीन है, जिसमें नायिका को नाश्ता बनाते, बेटी को सुलाते, बाज़ार से ख़रीदारी करते दिखाया गया है। नायक अपने कार्यालय में और बेटी स्कूल में व्यस्त है। सभी अपने-अपने काम निपटाते हुए अपने कामों से बेहद असंपृक्त नज़र आते हैं। यहाँ तककि परेशान होने पर परेशानी के या खुश होने पर खुशी के भाव भी उनके चेहरों पर परिलक्षित नहीं होते। पात्रों के चेहरे ही बहुत कम दिखाए गए हैं (पता नहीं, अभिनेताओं ने इसे कैसे स्वीकार किया होगा क्योंकि उनके लिए अभिनय की गुंजाइश ही फिल्म में बहुत कम है) और खाना बनाते या खाते हुए हाथों की मुद्राएँ और बर्तनों की आवाज़ भर हैं। इसी तरह जूते के फीते बांधते समय, दुकानों में ख़रीदारी करते समय या आँखों की जाँच कराते समय लंबे-लंबे दृश्यों में क्रमशः जूते, बिलिंग मशीन या आँखों की पुतलियाँ हैं, चेहरे कहीं नज़र नहीं आते।  

       सामान्य रूप से पात्र अपनी छोटी-मोटी समस्याओं से जूझते और कहीं-कहीं उनसे सफलता पूर्वक पार पाते भी नज़र आते हैं। नायक अपने काम में व्यस्त रहता है इसलिए नायिका अपने ससुर को चिट्ठियाँ लिखती है, जिनमें इन्हीं मामूली बातों, जैसे नायक के ऑफिस की राजनीति, अपने भाई की समस्याएँ, बेटी की बीमारी आदि का ठंडा, गंभीर और विस्तृत वर्णन है। फिल्म के पहले दो हिस्सों में इन घिसी-पिटी दिनचर्या के दृश्यों के बाद अंतिम हिस्से में परिवार को अपने माता-पिता के यहाँ से वापस लौटते दिखाया गया है। घर आते ही नायक पहली बार अपने पिता को पत्र लिखता है, जिसमें वह देश छोडकर आस्ट्रेलिया में बसने के अपने इरादे को स्पष्ट करता है।

हालांकि यह तीसरा हिस्सा ही सबसे अधिक रोमांचक (और खौफनाक) है लेकिन इससे अधिक बताने पर फिल्म की उत्सुकता समाप्त हो सकती है इसलिए फिल्म का विवरण यहीं तक। 

और हाँ, हानेके की फिल्मों में मीडिया पर कोई टिप्पणी न हो ऐसा हो ही नहीं सकता। इस फिल्म में भी कई बार रेडियो पर ईराक-ईरान युद्ध, गोर्बाचेव आदि के समाचार चल रहे होते हैं और फिल्म चित्रविहीन टीवी के चींटियों के झुंड और खरखराहट वाले लंबे दृश्य के साथ समाप्त होती है।  

Friday, January 16, 2015

हानेके और उनकी फिल्में :

हानेके इस समय मुझे पश्चिमी दुनिया के सबसे प्रतिभाशाली फिल्म निर्देशक लगते हैं। प्रखर बुद्धिजीवी और दृश्य माध्यम को गहराई से समझने वाले और उसका भरपूर इस्तेमाल करने वाले फ़िल्मकार। सन 2012 में वे फिल्म 'अमोर' से अधिक चर्चा में आ गए लेकिन उनकी किसी भी फिल्म को इससे कमतर नहीं कहा जा सकता। अपनी फिल्मों में वे बहुत साधारण विषयों को उठाते हैं मगर उनका मन्तव्य पश्चिमी समाज में व्याप्त असंतोष, बेचैनी और बिखराव की कहानी कहना होता है। एक नज़र में उनकी फिल्में व्यक्तिगत जीवन की सामान्य कहानियाँ लगती हैं मगर वे आपको भीतर तक दहला देती हैं। हिंसा या हत्या उनकी फिल्मों का स्थायी भाव है लेकिन एकाध फिल्म को छोडकर उनकी अन्य फिल्मों में रक्तरंजित और क्रूर गैंग-वार, खूनखराबा, बंदूकें या छुरेबाजी नहीं है, जैसा कि कई प्रसिद्ध पश्चिमी निर्देशकों की, खासकर हॉलीवुड के निर्देशकों की फिल्मों में देखने को मिलता है और न ही कोई हीरोपंती है। अधिकतर फिल्मों में मुख्य पात्र दयनीय मृत्यु के शिकार होते हैं या दर्दनाक मृत्यु का साक्षात्कार करते हैं। 
फिल्म, टीवी और मीडिया पर हानेके के साक्षात्कारों से यू ट्यूब भरा पड़ा है, जिनमें वे समाज, राजनीति और जीवन के सभी पहलुओं पर मीडिया के प्रभाव पर महत्वपूर्ण चर्चा करते हैं। एक इंटरव्यू में वे कहते हैं: “हम मीडिया में दिखाए जा रहे यथार्थ को यथार्थ मानकर चलते हैं मगर वास्तव में वह यथार्थ नहीं होता बल्कि यथार्थ का चित्र या यथार्थ का वीडियो होता है। जब हम टीवी पर आ रहे समाचारों को सच मानने लगते हैं तो दरअसल अपनी समझ को भोथरा कर रहे होते हैं। दरअसल वह यथार्थ नहीं होता बल्कि वास्तविक छवियों के बहाने दिखाया जाने वाला झूठ होता है।” जब हम कहते हैं कि मृत्यु या बलात्कार के समाचार अब हमें पहले की तरह नहीं झँझोड़ते, तो शायद इसका कारण यही होता होगा।
सत्य को कहने में हानेके महज तटस्थ नहीं बल्कि बेहद क्रूर हैं। किसी भी फिल्म में व्यर्थ भावुकता का नामोनिशान नहीं है। कई बार लगता है कि हानेके के पात्रों में संवेदनशीलता का अभाव है। संभव है यह पश्चिमी समाज की आज की परिस्थिति से उपजी उदासीनता का प्रतिबिंब हो। हम एशियाइयों के लिए यह समझना मुश्किल होगा कि आखिर यह उदासीनता, असंतोष और निराशा पश्चिमी समाज में क्योंकर है। कुछ फिल्मों में हानेके यह बताने का प्रयास करते हैं कि वह समाज प्रगति और सुख-संतुष्टि के ऐसे दौर में प्रवेश कर चुका है जहाँ आगे उनके करने के लिए कुछ नहीं है, कोई खास संघर्ष नहीं है, सिवा इसके कि अपनी इस सुरक्षित आरामगाह को दुनिया के भूखे नंगे लोगों से बचाकर रखा जाए, और इसलिए उनके जीवन में व्यर्थता बोध भर गया है। 
हानेके की फिल्में बहुत धीमी गति से चलती हैं लेकिन उनमें एक तरह के पेसिव आतंक का ऐसा सम्मोहन है कि आप उसके एक फ्रेम को भी मिस करना नहीं चाहेंगे, बार-बार रिवाइंड करके देखना चाहेंगे, जैसे कुछ छूट गया हो। कई बार महसूस होता है उनकी फिल्मों के कई फ़लक हैं। आप उनकी फिल्में एक बार देखकर संतुष्ट नहीं होंगे, बार-बार देखना चाहेंगे और हर बार वह आपको नई लगेंगी, हर बार एक दूसरा फ़लक खुलता नज़र आएगा। 
दुर्भाग्य से हानेके की एक भी फिल्म न सिर्फ हिन्दी में डब नहीं की गई है बल्कि किसी भी फिल्म के सबटाइटल हिन्दी में उपलब्ध नहीं हैं। यह एक बड़ा काम है, जिसे फिल्म प्रेमियों को करना चाहिए। मैंने भी अभी उनकी कुछ फिल्में नहीं देखी हैं। हानेके से परिचय करवाने के लिए अरविंद Ar Vind का शुक्रिया अदा करना चाहता हूँ। शुरू की कुछ फिल्में अशोक गुप्ता Ashok Gupta से मुझे प्राप्त हुईं, उनका भी शुक्रिया। 

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