(क्रिकेट प्रेमियों
के मन में कभी न कभी यह प्रश्न अवश्य उठा होगा कि इस खेल का यह अजीबोगरीब नाम कैसे
पड़ा होगा। फुटबाल का फुटबाल समझ में आता है, कबड्डी का कबड्डी समझ में आता है, टेनिस
का टेनिस या जूड़ो का जूड़ो समझ में आता है मगर क्रिकेट खेल का क्रिकेट यानी झींगुर से क्या
संबंध हो सकता है? इसी पर एक रिसर्च पेपर बहुत पहले पढ़ा था। आप भी
पढिए।)
दूसरी ललित कलाओं, मसलन; चित्रकारी, मूर्तिकला, संगीत, नृत्य, साहित्य और नाट्यकला की तरह खेल भी जीवन का प्रतिबिंब बनें इसके लिए काफी समय से लोग प्रयासरत थे। पर होता यह था कि कुछ आधुनिक और बेहद लोकप्रिय खेल थोड़े-बहुत आभिजात्य का प्रदर्शन करते थे तो कुछ अराजकता और लंपटता का। अधिकतर आदिम खेल बिलकुल गणितीय और विज्ञानसम्मत थे कि ताकतवर और तेज़ की जीत सौ प्रतिशत तय होती थी। एक प्रयोग के रूप में हजारों साल पुराने अतीत की नकल पर उन सभी आधुनिक और पौराणिक खेलों का एक मिला-जुला खेल शुरू किया गया पर सारे विश्व की सहभागिता और साल-दर-साल के महाकाय अनुष्ठानों के बाद पाया यह गया कि उससे सारे विश्व में संदेह की गाढ़ी दुर्गंध फैल गई है। इस कई खेलों के एक खेल से यही पता चलता था कि दो-चार हज़ार साल का समय जीवन की विराटता के सामने कितना तुच्छ है क्योंकि पुरातन अतीत के क्रीड़ांगणों में खेले जाने वाले हत्याओं और रक्तपिपासु खेलों से ये खेल बिल्कुल अलग नहीं लगते थे। खेल बिल्कुल स्पष्ट और तर्कपूर्ण थे और उनके परिणाम अवश्यंभावी और सूत्रबद्ध। कलावस्तु बनने के लिए जहाँ उन्हें इन बातों के आभास का निर्माण करते हुए उनके भीतर छिपे सूक्ष्म और सघन यथार्थ का दर्शन कराना चाहिए था, वे सिर्फ एक विशाल, भुरभुरा ढूह भर निर्मित करते थे। हालांकि आयोजकों की जी तोड़ कोशिश और लोगों की सदिच्छा और भोलेपन के कारण अधिकांश लोग यह बात समझ नहीं पाते थे पर उनके अवचेतन में हताशा, असमंजस और इंकार भर रहा था। कुछ दृश्य के आरपार देख पाने वाली आँखें चिंता में थीं। उन्हें एक ऐसा खेल चाहिए था जो विज्ञानसम्मत और गणितीय तो हो पर अपने भीतर जीवन की जटिलताओं को कलात्मक रूप से व्यक्त भी कर सके। हालांकि विज्ञान, गणित और प्रकृति को तकनीकी रूप से जीवन पर लागू करने का रिवाज चरम पर था मगर उससे जीवन की जटिलताएँ सुलझने की जगह और भी गूढ़ होती जाती थीं। इन विषयों के इने-गिने अत्यंत दृष्टिसंपन्न और प्रतिभाशाली लोगों को छोड़कर अधिकांश लोग विज्ञान, गणित और प्रकृति की असंदिग्ध विशुद्धता, त्रुटिहीनता और उसको सब कुछ जान-समझ लेने का एकमात्र उपाय मानने के परंपरागत सोच से बाहर नहीं निकल पाए थे। एक तरफ संभावना सिद्धान्त होने और न होने के बीच वाली खाली जगह में कभी इधर तो कभी उधर सिर फोड़ता तो दूसरी तरफ अनंत असंभावना की परिधि में सूराख करने के प्रयासों को कुचला जा रहा था। दृश्य के भीतर प्रवेश करते ही अंधकार छा जाता था और अच्छे-खासे एहसास के बावजूद आँख-मिचौली के खेल में उसकी आत्मा पकड़ में नहीं आती थी। (क्रमशः)
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