Tuesday, January 27, 2015

तय करें कि आप किस तरफ हैं

मोटर साइकल लेकर आप थोड़ा शहर छोडकर 40-50 किलोमीटर गाँवों की तरफ निकल जाइए, आपको टूटे-फूटे घरों के बाहर अच्छे खासे जवान लोग यूँ ही बैठे मिलेंगे। अगर आप अपनी मोटर साइकल रोक देंगे तो आपको घेर लेंगे। आसपास उनके बच्चे रो रहे होंगे या धींगा-मस्ती कर रहे होंगे और महिलाएँ भी ऐसे ही खटर-पटर करती मिलेंगी। ये लोग कौन हैं? सोचें कि आखिर जब वहाँ से कुछ ही दूरी पर आप और आप जैसे लोग कोई न कोई काम, चाहे वह कोई झण्डा लिए आंदोलन ही क्यों न कर रहे हों, कुछ न कुछ कर रहे हैं, ये लोग ऐसे अलसाए से बेकार क्यों बैठे हैं।

वैसे तो इन लोगों को खेतिहर 'मजदूर' कहा जाता है लेकिन ये दरअसल निचली जातियों वाले बेरोजगार या अर्ध बेरोजगार हैं, जिन्हें कभी-कभी कोई काम मिल जाता है मगर कोई पक्का काम नहीं है। क्योंकि अगर मजदूर होते और काम नहीं होता तो कोई न कोई झण्डा इनके हाथ में होता, अपने काम की सुरक्षा के लिए कोई न कोई आंदोलन कर रहे होते। सरकार की रोजगार गारंटी योजना में भी इन मजदूरों के लिए 100 दिन के रोजगार का ही प्रावधान है और वह भी सरकारी भ्रष्टाचार के चलते ज़्यादा से ज़्यादा 40% तक ही मिल पा रहा है। 2011 में ऐसे तथाकथित 'मजदूरों' की संख्या 14.5 करोड़ थी और यह संख्या 2000 प्रतिदिन की दर से बढ़ रही है। सरकारी आँकड़े भी इन्हें 'मजदूर' कहती है और सभी राजनीतिक दल भी। संगठित क्षेत्रों में रोजगार पाए 4-5% मजदूरों की यूनियने हैं, जो इन्हें अपना कामरेड कहती हैं क्योंकि ऐसा कहने पर उनकी संख्या का बल उन्हें मिल जाता है। लेकिन दोस्तों, यह एक बहुत बड़ा फ्रॉड है, घपला है जो इनके साथ किया जा रहा है। दरअसल ये लोग 'मजदूर' नहीं, बेरोजगार हैं। न तो ये किसी पूंजीपति, कार्पोरेशन, किसान या सरकार के नौकर हैं और न ही खुद इनके पास कमाई का कोई जरिया है। इनका कोई संगठन भी नहीं है कि ये कोई आंदोलन करें।

देश में आदिवासियों की संख्या लगभग 7 करोड़ है। ये लोग जंगलों और पहाड़ों को अपनी मिल्कियत समझने वाले भोले-भाले लोग है, जिनके पास दुनिया के नियमों के अनुसार देखा जाए तो कोई संपत्ति नहीं है। उन्हें समझ में नहीं आता कि वे जिन जंगलों, पहाड़ों और जिस भूमि पर हजारों सालों से रह रहे थे अब उनकी नहीं है, लोग (सरकारें और पूंजीपति) उसे खरीद-बेच रहे हैं। वे अपने ही घरों में अपने आपको अजनबी महसूस कर रहे हैं। इनके लिए सरकारी आँकड़ों में या तो कोई खास वर्ग नहीं है और उन्हें या तो आदिवासी कह दिया जाता है या फिर उन्हें भी खेतिहर 'मजदूर' वाले खाने में डाल दिया जाता है। इनके पास अगर कोई रोजगार है तो जंगल से फल-फूल या लकड़ी ले आना, मामूली खेती करना और किसी तरह ज़िंदा रहना। और वे भी अब उनके नहीं रहे। ठीक से देखेंगे, अपने आधुनिक मापदंड ईमानदारी से उन पर लागू करेंगे तो आप भी उन्हें बेकार या बेरोजगार ही कहेंगे। और जब बेरोजगार हैं, यानी मजदूर नहीं हैं तो फिर उनका भी कोई संगठन नहीं है। न कोई झण्डा है और न ही कोई आंदोलन है।


जंगलों, पहाड़ों और गाँवों के बाद अब शहरों में भी यही स्थिति मुँह बाए खड़ी है। कोयला मजदूरों के आंदोलन के बाद बैंको का आंदोलन भी असफल हो गया है। 15000 लोगों को आईटी कंपनियों से निकाला जा चुका है और यह पहली किस्त है। संगठित क्षेत्रों में काम करने वाले मजदूरों के बेरोजगार होने की रफ्तार अब बहुत तेज़ होने वाली है। शहर में संगठित क्षेत्रों में ऐसे बेरोजगार हुए लोग कोई न कोई आंदोलन करेंगे, करते ही रहते हैं क्योंकि शहरों में हुई तोड़-फोड़ को सुनने और देखने वाले लोग दुनिया भर में बड़ी संख्या में मिल जाते हैं। लेकिन अच्छी तरह समझ लीजिए, जब तक उपरोक्त बहुसंख्यक सर्वहारा को यानी ऐसे मजदूरों को जिनके पास कोई काम नहीं है या जिनकी छटनी कर दी गई है या सीधे शब्दों में ऐसे बेरोजगारोंको सही मानी में, पूरी वामपंथी गरिमा और इज्ज़त के साथ आप अपने साथ नहीं लेते तब तक आपका कोई भला नहीं होने वाला है। मार्टिन निमोलार और मुक्तिबोध की कविताओं का पाठ बहुत कर लिया मित्रों, कम से कम अब उन पर अमल करने का वक़्त है।  वे आदिवासियों को लूटने आए, आप 67 साल चुप रहे, वे हिन्दू/मुसलमान दलितों के लिए आए, आप बगले झाँकते रहे, किसी न किसी बहाने उनके दमन पर चुप रहे और आज भी हैं, खेतिहर बेरोजगार (मजदूर नहीं) भूखों मरते रहे, आप चुप रहे। अब वे आपकी जमीनें छीन रहे हैं, आपकी खदानें बेच रहे हैं, आपकी नौकरियाँ छीन रहे हैं, आपकी तनख़्वाहें नहीं बढ़ाते तो आपको तकलीफ हो रही है। मैं जानता हूँ, अधिकांश संगठित मजदूर यानी तथाकथित सर्वहारा इसमें भी यही राह देख रहा है कि किसी न किसी तरह उसका जुगाड़ लग जाए, बाकी जाएँ भाड़ में। कुछ दिन पहले एक मीडियाकर्मी को निकाल दिया गया और अचानक वे शहीद हो गए। ऐसी शहादत शहादत नहीं मतलबपरस्ती है। फिर भी अभी भी समय है, तय करें कि आप किस तरफ हैं!   

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