Tuesday, February 10, 2015

झींगुर (5)

यह भ्रम ही होगा कि क्रिकेट बहुत उत्तेजक खेल था। बल्कि, इसके विपरीत, पूरे पाँच दिन के खेल में कभी-कभार ही रोमांच के क्षण आते। कभी-कभी थोड़ा-बहुत तनाव छोटे-छोटे बुलबुलों की शक्ल में इकट्ठा होता रहता और खेल के अंत में ही चरम पर पहुँचता। पर, कई बार ऐसा भी होता कि लंबा समय बिना किसी उत्तेजना के बीतता रहता, जैसा कि बहुत से जीवनों में भी देखने में आता था, और खेल खत्म हो जाता। यह भी लग सकता है कि क्रिकेट का खेल यथार्थ से कोसों दूर था, तर्कसंगत नहीं था या उसमें वास्तविकता बेहद गड्डमड्ड थी। पर, यही बात जीवन में भी थी। क्रिकेट का विकास ही कुछ इस तरह से हो गया था कि, पुनरावृत्ति के बावजूद यह कहना उचित ही होगा कि न सिर्फ वह जीवन का आईना था बल्कि उसके और जीवन के बीच बेहद तरल और नामालूम सा आवागमन था और जब खेल का यथार्थ उपलब्ध हो जाता था तो ऐसा लगने लगता था कि आगे वह जीवन के यथार्थ की खोज में निकल पड़ा है। क्योंकि, यह मानने के बाद भी कि क्रिकेट का भौतिक, मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक ताम-झाम काफी विशाल था, वह जीवन की विराटता के सम्मुख कुछ भी नहीं था और जिस तरह समुद्र के पानी में नमक की उपस्थिति जानने के लिए उसकी एक बूंद पानी का परीक्षण ही काफी होता है, जीवन में यथार्थ की ठीक-ठीक उपस्थिति समझने के लिए, या कहें, उस पर उंगली रखने के लिए क्रिकेट का उपयोग करना उचित ही था। हालांकि ऐसी किसी संभावना का पता ही किसी को नहीं था, पर कोई बेहतर मस्तिष्क यह काम कर सकता था, जिससे जीवन के दृश्य यथार्थ, लगभग यथार्थ, पूर्ण यथार्थ और अति-यथार्थ का ठीक-ठीक पता चल सके। और यही सब बातें क्रिकेट को एक अलौकिक कलारूप बना देती थीं। हालांकि क्रिकेट की इन सब खूबियों को समझने के लिए गंभीर आध्यात्मिक दृष्टि और दार्शनिक बुद्धि की आवश्यकता थी फिर भी साधारण लोगों के लिए उन्हें कुछ मोटे नियमों में बाँधकर सहज और बोधगम्य बना दिया गया था।
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Sunday, February 8, 2015

फदील अल-अज़्ज़वी की कविताएँ

(आज फदील अल-अज़्ज़वी की कविताओं के पाठ का दिन है। संभव है अनुवाद में बहुत सी त्रुटियाँ हों। नाम भी सही लिखा है या नहीं, पता नहीं। मुझे बहुत अच्छी लग रही हैं और मैं उनके सुरूर में उनके तुरत-अनुवाद किए जा रहा हूँ।)

जब मेरे पास कोई काम नहीं होता/फदील अल-अज़्ज़वी
जब मेरे पास कुछ काम नहीं होता तो अपनी लम्बी बोरियत के समय
मैं एक जगह बैठकर धरती के गोले से खेलने लगता हूँ।
मैं ऐसे देशों की स्थापना करता हूँ, जहां पुलिस और पार्टियां नहीं होतीं
और उन देशों को मिटा देता हूँ, जो अब उपभोक्ताओं को आकर्षित नहीं कर पाते।
मैं रेगिस्तानों में गरजती नदियों को उकेरता हूँ
और महाद्वीपों और समुद्रों की रचना करता हूँ
फिर उन्हें भविष्य के लिए अलग रख लेता हूँ कि शायद कभी ज़रूरत पड़े।
मैं राष्ट्रों के नए रंगीन नक्शे तैयार करता हूँ:
जर्मनी को लुढ़काकर प्रशांत महासागर में व्हेल मछलियों के साथ पटक देता हूँ
और गरीब शरणार्थियों को
समुद्री डाकुओं की नावों में बिठाकर
घने कोहरे में
उसके तटों तक पहुंचा देता हूँ।
वहां वे बवेरिया के उन बगीचों के सपने देखते हैं,
जिनका उनसे वादा किया गया था।
मैं इंग्लैंड को अफगानिस्तान से अदल-बदल कर देता हूँ,
जिससे वहाँ के नौजवान हर-मेजेस्टी द्वारा नवाज़ी गई मुफ्त हशीश का मज़ा ले सकें।
कुवैत को, उसकी बाड़ों और बारूदी सुरंगों के बीच से चोरी-चोरी उठाकर
चंद्रग्रहण के चाँद से द्वीपों, कोमोरोस पर ले आता हूँ,
निश्चित ही तेल के कुंओं सहित!
इसी समय मैं बगदाद को
ढोल-नगाड़ों के शोर के बीच
ताहिती द्वीप पहुंचा देता हूँ।
सऊदी अरब को मैं उसके शाश्वत मरुस्थल में
दुबके पड़े रहने के लिए छोड़ देता हूँ,
जिससे वह अपने ऊंटों की कुलीन नस्ल की पवित्रता को बचाकर रख सके।
इतना सब कुछ मैं अमरीका को
उसके मूल निवासी रेड-इंडियंस को सौंपने से पहले कर लेता हूँ,
सिर्फ इसलिए कि इतिहास को उसका बहु-प्रतीक्षित न्याय मिल सके।
मैं जानता हूँ कि दुनिया को बदलना इतना आसान नहीं है
लेकिन फिर भी यह जरूरी तो है ही।
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जादुई कविता कैसे लिखी जाए!/फदील अल-अज़्ज़वी
जादुई कविता लिखने से सरल कोई काम नहीं है।
अगर आपमें तीव्र आकांक्षा और मजबूद इरादे हैं तब तो बेहद आसान।
इतना दावे के साथ कह सकता हूँ कि यह उतना कठिन काम नहीं है।
एक रस्सी लीजिए और उसे बादलों में बांध दीजिए।
उसका दूसरा हिस्सा नीचे लटकने दीजिए।
बच्चे की तरह रस्सी पकड़कर ऊपर चढ़ जाइए।
और फिर रस्सी को नीचे फेंक दीजिए।
और फिर हम आपको ढूंढ़ते रहेंगे, यूं ही
हर कविता में।
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Saturday, February 7, 2015

झींगुर (4)

क्रिकेट दूसरे सभी खेलों से सिर्फ अलग ही नहीं बल्कि कई बार लगता था कि वह खेल ही नहीं है, कोई और ही चीज़ है। कई विद्वान उसकी जटिलता में उलझे, उसकी साधारण सी लगने वाली बातों के गूढ़ार्थों को समझने की कोशिश की पर कुछ न समझ पाने पर थक-हारकर बैठ गए। यहाँ तककि उसका नाम भी तर्कहीन लगता था। झींगुर, जिसे एक छोटे से इलाके में क्रिकेट कहा जाता था, किसी खेल का नाम हो सकता है, यह बात उस समय भी किसी के गले नहीं उतरती थी। काफी समय भाषाविद और इतिहासकार उसके नाम को लेकर माथापच्ची करते रहे पर कुछ पता नहीं चल पाया। कठिन प्रश्न था कि जिसने भी सबसे पहले इस खेल को 'क्रिकेट' कहा, उसके अवचेतन में क्या बातें चल रही थीं? क्या उसने इस शोधपत्र में वर्णित सारी घटनाएँ, अवचेतन में ही सही, देखी थीं? क्या उसे क्रिकेट के खेल में झींगुरों की अकाट्य भूमिका के बारे में मालूम था? दरअसल, उस वक़्त उनके जीवन और सोच के मुक़ाबले समय बहुत विशाल था। कई बातें दिखती तो थीं पर दिखते ही तुरंत विलुप्त हो जाती थीं, जैसे दिखी ही न हों। कुछ बातें इतनी तेज़ गति से घटित होती थीं कि बातों का अंतिम परिणाम ही दिखाई पड़ पाता था। हर बात में तर्क ढूँढ़ने का चलन था और जहाँ बातें तर्कहीन और अस्पष्ट होतीं, वहाँ उन्हें विभ्रम, दिवास्वप्न या मिथ्या-स्मृति मान लिया जाता था। पर स्पष्ट ही, इस नामकरण के पीछे भी कोई न कोई तर्क ज़रूर रहा होगा, जो शायद रफ्तार और विशालता में गुम हो गया था।  
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Thursday, February 5, 2015

एक ऐतिहासिक लव जेहाद

(आज एक ऐतिहासिक 'लव-जेहादकी कहानी कहता हूँ।)
टांडा (उत्तरी बंगाल) के राजा सुलेमान किर्रानी और भूरिश्रेष्ठ (मध्य बंगाल) के राजा रुद्रनारायन और ओडिशा की संयुक्त फौज के बीच त्रिवेणी नामक स्थान पर भयंकर युद्ध हुआ थाजिसमें अफगान फौज की बुरी तरह हार हुई थी। हिन्दू राजाओं की इस विजय का सूत्रधार थाराजीवलोचन राय नमक सेनापतिजिसने अदम्य साहस का प्रदर्शन करते हुए अफगान सेनाओं को भारी नुकसान पहुंचाया था और उसे हिन्दू सेनाओं से अपमानजनक समझौता करना पड़ा। हार के बाद होने वाली समझौता वार्ताओं में किर्रानी की बहुत सुंदर युवा पुत्रीदुलारी हमेशा उपस्थित रहती थी। दोनों आपस में प्रेम करने लगे मगर धर्म बीच में आ गया। राजीवलोचन इस्लाम अपनाने के लिए तैयार नहीं था। आखिर दुलारी ने हिन्दू होना कुबूल कर लियाजिसे किर्रानी ने भी अपनी सहमति दे दी। लेकिन विवाह के बाद जब राजीवलोचन अपने घर आया तो उनके विवाह को धर्मविरोधी कहकर उनका बहिष्कार किया गया। जब उसने कहा कि दुलारी ने हिन्दू धर्म अपना लिया है तो पंडितों ने कहा कि धर्म परिवर्तन करके कोई हिन्दू नहीं हो सकता।
राजीवलोचन राय ने पंडितों से कहा कि अब गलती तो हो गई हैकोई प्रायश्चित्त बताइएजिससे मेरा प्रेम और विवाह भी सुरक्षित रहे और मुझे समाज से बहिष्कृत भी न होना पड़े। पंडितों ने जो प्रायश्चित्त तजवीज किया था वह बहुत कठिन था: जगन्नाथ पुरी के गर्भगृह में एक माह निराहार रहकर कठोर तपस्या करना। बेचारे राजीवलोचन ने यह भी कियाएक माह बाद जब वह गर्भगृह से बाहर आया तो सूखकर कांटा हो चुका था। मगर कोई न कोई बहाना बनाकर पुरी के पंडों ने यह प्रमाणपत्र देने से इंकार कर दिया कि उसका प्रायश्चित्त धर्म सम्मत तरीके से पूरा हो चुका है और अब उनका विवाह भी पूरी तरह स्वीकार्य है। वह बहुत गिड़गिड़ाया मगर पंडों ने एक न सुनी। निराश राजीवलोचन ने वहीं निश्चय कर लिया था कि अब न सिर्फ हिन्दू धर्म छोड़ देना है बल्कि इस धर्म और इसकी निशानियों को पूरी तरह नष्ट कर देना है।
वापस लौटकर दोनों पतिपत्नी सुलेमान किर्रानी के यहाँ आए और पुनः इस्लाम कुबूल कर लिया। उसने अपना नाम काला पहाड़ रख लिया और अपने हिन्दू राजा को छोडकर सुलेमान किर्रानी की सेना में शामिल हो गया। उसके बाद सुलेमान किर्रानी से इजाज़त लेकर वह सबसे पहले ओडिशा आया और पुरी के मंदिर को पूरी तरह तबाह कर दिया। कोणार्क और भुवनेश्वर के मंदिरों को भी उसी ने तहस नहस किया था। वहाँ के पुरोहितों को समुद्र किनारे रेत में ज़िंदा गाड़ दिया गयाजिन्हें बाद में जंगली जानवर खा गए।
उसने सिर्फ ओड़ीशा पर ही विजय प्राप्त नहीं की। बाद में उसने कूचबिहार होते हुए आसाम की ओर कूच किया और वहाँ का राज्य फतह करके वहाँ के प्रसिद्ध कामाख्या मंदिर का ध्वंस किया। बाद में वह पश्चिम की तरफ बढ़ा और अपनी मौत से पहले तक अवध तक के बहुत से छोटे-छोटे राज्य उसके कब्जे में आ चुके थे। वह जहाँ भी जाता वहाँ के मंदिरों को तोड़ता और लोगों लोगों का जबरदस्ती धर्मपरिवर्तन करवाता और इस्लाम कुबूल न करने की हालत में उनकी हत्या कर देता।
ऐसे ही एक युद्ध के दौरान उसकी मौत ओडिशा के सम्बलपुर में हो गई थीजहाँ स्थित उसकी और दूसरे बहुत से सैनिकों की कब्रों को "हिन्दू देशभक्तों" ने 2006 में नष्ट कर दिया।
(इस कथा का कुछ हिस्सा तो इतिहास सम्मत है लेकिन कुछ हिस्सा ई थियोडोर किंग की कहानी, 'काला पहाड़से लिया गया है। इसके अलावा विकिपीडिया से भी कुछ जानकारी ली गई है। कहानी पढ़ते समय यह भी याद रखें कि कालापहाड़ एक कट्टर हिन्दू थाजिसने प्रेम के लिए भी इस्लाम कुबूल करने से इंकार कर दिया था। मजबूरन इस्लाम कुबूल करने के बाद वह कट्टर मुसलमान हो गया तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं।)


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झींगुर (3)

जब क्रिकेट की तुलना मनुष्य द्वारा आविष्कृत दूसरे खेलों से की जाती थी तो वह अजीबोगरीब और मूर्खतापूर्ण लगता था। उसका मैदान गोल या अंडाकार होता था और मैदान का विस्तार भी नियत नहीं होता था। कोई बड़ा तो कोई छोटा! खेल पाँच दिन तक चलता था और जब खिलाड़ी मैदान में उतरते तो लगता, वे यूँ ही टहलने निकले हैं। मैदान में ही खाना-पीना, गपशप, हँसी-मज़ाक और कई बार आराम वगैरह भी चलता रहता था। अधिकतर, बल्कि सभी खेलों के विपरीत क्रिकेट में प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ियों के उद्देश्य अलग-अलग होते थे। जैसे एक खिलाड़ी, माना कि गेंदबाज़ अपने प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ी के पीछे ठुँके डंडे बिखेरना चाहता था तो यह नहीं कि उसका प्रतिद्वंद्वी भी उसके साथ यही करना चाहता हो। उसका उद्देश्य कुछ दूसरा होता था, जैसे वह गेंद को सीमा पार भेजना चाहता था। फिर, यह बड़ा अन्यायपूर्ण था कि जान जोखिम में डालकर क्षेत्ररक्षक खिलाड़ी प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ी के बल्ले से निकली गेंद लपकता, पर सेहरा बाँधा जाता गेंदबाज के सिर। पर यही अजूबे और मूर्खताएँ अनोखी लगतीं, बल्कि अभिभूत करतीं, जब उन्हें गहराई से देखा जाता और पाया जाता कि प्रकृति में हर चीज़ गोल है न कि चौकोर और हालांकि जीवन में भी तनाव के क्षण आते हैं पर उसका चक्र भी, अधिकतर, सहज गति से लुढ़कता रहता है। इसके अलावा क्रिकेट की तरह जीवन में भी यह बात आम थी कि करता कोई था और भरता कोई या लड़ता कोई था और ताज किसी दूसरे के सिर चढ़ता था। लोगों को यह भी समझ में आता कि प्रकृति भी उनके साथ वैसा ही व्यवहार नहीं करती जैसा वे उसके साथ करते हैं। विद्वान भी बताते थे कि मनुष्य ने अपने विकास की उस अवस्था को प्राप्त कर लिया है जहाँ उसे जीवित रहने के लिए बर्बर होना आवश्यक नहीं है। पता नहीं क्यों, अब तक उनके खेलों में वह बात आ नहीं पाई थी और संस्कार की कई सहस्राब्दियाँ गुज़र जाने के बावजूद वे अधिकतर खेलों में बर्बर ही बने हुए थे। क्रिकेट उनमें अपवाद बनने जा रहा था। 
क्रिकेट की सबसे खास बात यह थी कि खेल और जीवन के बीच उसमें बेहद सहज आवागमन था। एक अटूटता और एकात्मता थी, जो दोनों को एक-दूसरे से अलग नहीं होने देती थी। कई खिलाड़ी मैदान में न होते हुए भी बाकायदा खेल में शरीक रहते थे और बहुत से मैदान में रहते हुए भी खेल से लगभग बाहर। कई बार गेंद किसी जानलेवा हृदयाघात की तरह बल्ले से टकराती और फिर किसी मरती हुई संभावना की तरह दो-चार टप्पे खाकर खुद ही ढेर हो जाती। इसके विपरीत, कई बार खुशी, इत्मीनान, पराक्रम और विजय के एहसास की धुंध को फोड़कर मौत आती और खिलाड़ी अपने आपको मैदान की नर्म मिट्टी में जज़्ब होता हुआ देखता। एक उदाहरण के रूप में इस बात का उल्लेख किया जा सकता है कि जब गेंद बल्ले से लगकर किसी क्षेत्ररक्षक के आसपास उछलती तो एक हल्की सनसनी हवा में फैल जाती। बल्लेबाज़ को महसूस होता, उसका दिल ही उछलकर क्षेत्ररक्षक के कालपाश में समा गया है। पहले तो वह क्षेत्ररक्षक गेंद को हवा में ही लपकने की जानलेवा कोशिश में ज़मीन पर छलांग लगा देता पर असफल रहने पर उसके पीछे दौड़ पड़ता। एक या दो दूसरे क्षेत्ररक्षक भी गेंद के पीछे दौड़ते और अब एक ही टोली के इन खिलाड़ियों के बीच रेस शुरू हो जाती। इधर गेंदपट्टी पर बल्लेबाज़ खिलाड़ी इधर से उधर भागते हुए पाले बदलते रहते, जैसे आपस में ही खेल रहे हों। इस तरह मैदान में कई तरह की टोलियाँ बन जातीं और कई तरह के अलग-अलग खेलों का प्रदर्शन होता हुआ दिखाई देता और देखने वालों में दर्शकों और मैदान के बाहर मगर खेल में शामिल खिलाड़ियों के अलावा बहुत से वे खिलाड़ी भी होते जो मैदान में ही मौजूद होते। सच बात तो यह है कि खेल सिर्फ मैदान या उसके बाहर स्टेडियम में बैठे दर्शकों के बीच ही महदूद नहीं रहता था बल्कि स्टेडियम के बाहर, चाय की दुकानों में, दफ्तरों में, घरों में, कारखानों में, खेत-खलिहानों में, दुनिया भर के कार्पोरेट ऑफिसों में और विज्ञापन एजेंसियों में, जूआघरों में, यहाँ तक कि अखबारों, किताबों, कंप्यूटरों, लोगों के दिमागों और उनकी उँगलियों की पोरों में भी वह खेला जाता था। हर गेंद के फिंकते ही मैदान में ही नहीं, इन जगहों पर भी कई तरह के खेल शुरू हो जाते, अखबारों, किताबों  के लेआउट बादल जाते, कंप्यूटरों के कॉलमों, पंक्तियों में आँकड़ों की उछल-कूद और भाग-दौड़ शुरू हो जाती। (क्रमशः) 

Wednesday, February 4, 2015

'वंस अपॉन ए टाइम...द रिवोल्युशन' सर्जिओ लिओनी की कम प्रसिद्ध फिल्म

सर्जिओ लिओनी बहुत प्रतिभाशाली इतालवी फ़िल्मकार माने जाते हैं, जो साठ के दशक में अमरीकी पृष्ठभूमि पर क्लिन्ट ईस्टवुड के साथ बनाई गई अपनी कुछ फिल्मों से बहुत लोकप्रिय हुए। उससे पहले अमरीकी वेस्टर्न फिल्में बहुत हिट हो चुकी थीं और उन्हीं की तर्ज़ पर लिओनी की फिल्मों को स्पेगेट्टी वेस्टर्न (या ज़पाटा वेस्टर्न) कहा गया और उनकी फिल्में भी पिछली वेस्टर्न फिल्मों की तरह विशाल अमरीकी भूक्षेत्र पर अमरीकी श्रेष्ठता की स्थापना की कथा ही कहती हैं, जिनमें स्थानीय लोगों को मूर्ख, पिछड़ा और क्रूर दिखाया जाता है, उनका मज़ाक बनाया जाता है और दूसरी तरफ अमरीकी मुख्य भूमि से आए हीरो को उनका मुक्तिदाता, मसीहा। उस समय जब यूरोप में युद्ध, कला और विभिन्न सामाजिक मूल्यों को लेकर एक से एक बेहतरीन फिल्में बनाई जा रही थीं तब लिओनी यूरोप छोड़कर पूरी तरह अमरीकी फिल्में क्यों बनाने लगे होंगे यह कहना मुश्किल तो है लेकिन मुझे लगता है बॉक्स ऑफिस उन्हें वहाँ खींच ले गया होगा। इसमें कोई शक नहीं कि उन्होंने अपना एक अलग स्टाइल और ट्रेंड अर्जित किया और इस लिहाज से वे प्रशंसा के हकदार हैं। लेकिन वंस अपॉन ए टाइम इन द वेस्ट को छोड़कर कोई भी फिल्म मुझे बहुत प्रभावित नहीं करती।
'वंस अपॉन ए टाइम...द रिवोल्युशन' सर्गेई लिओनी की अंतिम 'वेस्टर्न' फ़िल्म मानी जाती है। कहा जाता है कि कई कारणों से इसके प्रदर्शन पर विवाद होता रहा और उसे कई बार नाम तक बदलने पड़े! एक समय था जब क्रान्ति शब्द से ही अमरीकी नफरत करते थे और इस फ़िल्म के पहले दृश्य में ही माओ भी हैं, लिहाजा अमरीका में उसे 'डक, यू सकर!' (duck, you sucker!) नाम से प्रदर्शित करना पड़ा। यह नाम थोड़ा रफ-टफ और कूल था मगर यह फ़िल्म उतना नहीं चल पाई, न अमरीका में, न ही और कहीं। इस फिल्म का एक और नाम था फिस्टफुल ऑफ डाइनामाइट 
कामरेड रुद्र ने मुझे यह फिल्म देखने की सलाह दी थी। कहने को यह फिल्म बीसवीं सदी की शुरुआत में मेक्सिको में जारी क्रांतियों के बारे में है मगर सिवा नाम में रिवोल्यूशन शब्द के और पहली फ्रेम में माओ की एक उक्ति के इसमें क्रान्ति का कहीं कोई आभास तक नहीं है। यह फिल्म दो लुटेरों की कथा है: एक तो स्थानीय मेक्सिकन है और दूसरा आईआरए का भगोड़ा एक आइरिश है। इन क्रांतियों में किसी तरह के जन आंदोलन का चित्रण नहीं है और हालांकि कहानी में सत्ताधारी एक तानशाह है मगर फिल्म में यह लगभग दो गुटों की लड़ाई जैसी लगती है।  दोनों नायक भी अपने-अपने भाग्य या दुर्भाग्य से इत्तफाकन इन क्रांतिकारियों से जुड़ जाते हैं, इत्तफाकन ही क्रान्ति के हीरो भी बन जाते हैं लेकिन अंततः इनका मकसद भी किसी तरह लैंड ऑफ ड्रीम्स, अमरीका पलायन का ही होता है, विशेषकर मेक्सिकन डकैत का, जो रास्ते में आइरिश साथी के मारे जाने पर हताश होकर कहता है, वॉट अबाउट मी, अब मेरा क्या होगा? और फिल्म का टाइटल दिखाया जाता है डक, यू सकर! अपने आपको बचा, मूर्ख!
खैर, लिओनी की दूसरी फिल्मों की तरह यह फिल्म भी बहुत रोचक, पैसा वसूल फिल्म है लेकिन इसे भी मैं अमरीकी श्रेष्ठता को स्थापित करने के वैश्विक प्रोजेक्ट के एक हिस्से रूप में देखता हूँ, जो द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद शुरू हुआ और आज भी जारी है।


Tuesday, February 3, 2015

झींगुर (2)

और ऐसे समय में क्रिकेट को उसकी उत्कृष्टता, परिष्कृतता और अनुपमता के कारण महाकुंभ के लिए सर्वथा उपयुक्त पाया गया। वह एक संभ्रांत खेल माना जाता था और उसमें नियमों के साधारण उल्लंघन की बात सोची भी नहीं जाती थी। वह बहुआयामी और पर्तदार था और उसमें हर तरह की संस्कृतियों में भीतर तक समा जाने की अद्भुत खूबियाँ थीं। आध्यात्मिक महाभूमियों के लिए उसमें जीवन की क्षणभंगुरता से लेकर अकेले आने और जाने की विवशता, मृत्यु की आकस्मिकता, दूसरों के और अपने कर्मों के संयुक्त परिणाम के रूप में भाग्यभ्रम और अनहोनी थी। रूखे, आक्रामक, क्रूर और सख्तजान लोगों के लिए वहाँ गोल शीलाखंड की तरह सख्त गेंद थी, जिसे सिर्फ बीस गज़ की दूरी पर खड़े विपक्षी की तरफ पूरी ताकत के साथ लहराया जाता था। उसे बुरी तरह से आतंकित और लहूलुहान करने के लिए गेंद के भीतर बार-बार बदलती दिशा, बेढंगी उछाल, भीषण रफ्तार और एक रहस्यमय सनसनाहट भर दी जाती थी। हर हाल में दूसरों पर विजय पाने के आदी, अमीर और षड्यंत्रकारी रहन-सहन वालों के लिए उसमें बहुत सारी संभावनापूर्ण युक्तियाँ थीं, जिन्हें खेल शुरू होने से पहले ही कपटपूर्वक मैदान की हवा में स्थापित कर दिया जाता था। ये युक्तियाँ एक साथ ही मनोवैज्ञानिक, आतंककारी, मासूम, मनोरंजक, दोस्ताना और निर्दयी होती थीं और विपक्षी खिलाड़ियों के विश्वास को भ्रमित, गलित और कुंठित करती रहती थीं।  (क्रमशः)  

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