Thursday, February 5, 2015

झींगुर (3)

जब क्रिकेट की तुलना मनुष्य द्वारा आविष्कृत दूसरे खेलों से की जाती थी तो वह अजीबोगरीब और मूर्खतापूर्ण लगता था। उसका मैदान गोल या अंडाकार होता था और मैदान का विस्तार भी नियत नहीं होता था। कोई बड़ा तो कोई छोटा! खेल पाँच दिन तक चलता था और जब खिलाड़ी मैदान में उतरते तो लगता, वे यूँ ही टहलने निकले हैं। मैदान में ही खाना-पीना, गपशप, हँसी-मज़ाक और कई बार आराम वगैरह भी चलता रहता था। अधिकतर, बल्कि सभी खेलों के विपरीत क्रिकेट में प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ियों के उद्देश्य अलग-अलग होते थे। जैसे एक खिलाड़ी, माना कि गेंदबाज़ अपने प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ी के पीछे ठुँके डंडे बिखेरना चाहता था तो यह नहीं कि उसका प्रतिद्वंद्वी भी उसके साथ यही करना चाहता हो। उसका उद्देश्य कुछ दूसरा होता था, जैसे वह गेंद को सीमा पार भेजना चाहता था। फिर, यह बड़ा अन्यायपूर्ण था कि जान जोखिम में डालकर क्षेत्ररक्षक खिलाड़ी प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ी के बल्ले से निकली गेंद लपकता, पर सेहरा बाँधा जाता गेंदबाज के सिर। पर यही अजूबे और मूर्खताएँ अनोखी लगतीं, बल्कि अभिभूत करतीं, जब उन्हें गहराई से देखा जाता और पाया जाता कि प्रकृति में हर चीज़ गोल है न कि चौकोर और हालांकि जीवन में भी तनाव के क्षण आते हैं पर उसका चक्र भी, अधिकतर, सहज गति से लुढ़कता रहता है। इसके अलावा क्रिकेट की तरह जीवन में भी यह बात आम थी कि करता कोई था और भरता कोई या लड़ता कोई था और ताज किसी दूसरे के सिर चढ़ता था। लोगों को यह भी समझ में आता कि प्रकृति भी उनके साथ वैसा ही व्यवहार नहीं करती जैसा वे उसके साथ करते हैं। विद्वान भी बताते थे कि मनुष्य ने अपने विकास की उस अवस्था को प्राप्त कर लिया है जहाँ उसे जीवित रहने के लिए बर्बर होना आवश्यक नहीं है। पता नहीं क्यों, अब तक उनके खेलों में वह बात आ नहीं पाई थी और संस्कार की कई सहस्राब्दियाँ गुज़र जाने के बावजूद वे अधिकतर खेलों में बर्बर ही बने हुए थे। क्रिकेट उनमें अपवाद बनने जा रहा था। 
क्रिकेट की सबसे खास बात यह थी कि खेल और जीवन के बीच उसमें बेहद सहज आवागमन था। एक अटूटता और एकात्मता थी, जो दोनों को एक-दूसरे से अलग नहीं होने देती थी। कई खिलाड़ी मैदान में न होते हुए भी बाकायदा खेल में शरीक रहते थे और बहुत से मैदान में रहते हुए भी खेल से लगभग बाहर। कई बार गेंद किसी जानलेवा हृदयाघात की तरह बल्ले से टकराती और फिर किसी मरती हुई संभावना की तरह दो-चार टप्पे खाकर खुद ही ढेर हो जाती। इसके विपरीत, कई बार खुशी, इत्मीनान, पराक्रम और विजय के एहसास की धुंध को फोड़कर मौत आती और खिलाड़ी अपने आपको मैदान की नर्म मिट्टी में जज़्ब होता हुआ देखता। एक उदाहरण के रूप में इस बात का उल्लेख किया जा सकता है कि जब गेंद बल्ले से लगकर किसी क्षेत्ररक्षक के आसपास उछलती तो एक हल्की सनसनी हवा में फैल जाती। बल्लेबाज़ को महसूस होता, उसका दिल ही उछलकर क्षेत्ररक्षक के कालपाश में समा गया है। पहले तो वह क्षेत्ररक्षक गेंद को हवा में ही लपकने की जानलेवा कोशिश में ज़मीन पर छलांग लगा देता पर असफल रहने पर उसके पीछे दौड़ पड़ता। एक या दो दूसरे क्षेत्ररक्षक भी गेंद के पीछे दौड़ते और अब एक ही टोली के इन खिलाड़ियों के बीच रेस शुरू हो जाती। इधर गेंदपट्टी पर बल्लेबाज़ खिलाड़ी इधर से उधर भागते हुए पाले बदलते रहते, जैसे आपस में ही खेल रहे हों। इस तरह मैदान में कई तरह की टोलियाँ बन जातीं और कई तरह के अलग-अलग खेलों का प्रदर्शन होता हुआ दिखाई देता और देखने वालों में दर्शकों और मैदान के बाहर मगर खेल में शामिल खिलाड़ियों के अलावा बहुत से वे खिलाड़ी भी होते जो मैदान में ही मौजूद होते। सच बात तो यह है कि खेल सिर्फ मैदान या उसके बाहर स्टेडियम में बैठे दर्शकों के बीच ही महदूद नहीं रहता था बल्कि स्टेडियम के बाहर, चाय की दुकानों में, दफ्तरों में, घरों में, कारखानों में, खेत-खलिहानों में, दुनिया भर के कार्पोरेट ऑफिसों में और विज्ञापन एजेंसियों में, जूआघरों में, यहाँ तक कि अखबारों, किताबों, कंप्यूटरों, लोगों के दिमागों और उनकी उँगलियों की पोरों में भी वह खेला जाता था। हर गेंद के फिंकते ही मैदान में ही नहीं, इन जगहों पर भी कई तरह के खेल शुरू हो जाते, अखबारों, किताबों  के लेआउट बादल जाते, कंप्यूटरों के कॉलमों, पंक्तियों में आँकड़ों की उछल-कूद और भाग-दौड़ शुरू हो जाती। (क्रमशः) 

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