Tuesday, February 10, 2015

झींगुर (5)

यह भ्रम ही होगा कि क्रिकेट बहुत उत्तेजक खेल था। बल्कि, इसके विपरीत, पूरे पाँच दिन के खेल में कभी-कभार ही रोमांच के क्षण आते। कभी-कभी थोड़ा-बहुत तनाव छोटे-छोटे बुलबुलों की शक्ल में इकट्ठा होता रहता और खेल के अंत में ही चरम पर पहुँचता। पर, कई बार ऐसा भी होता कि लंबा समय बिना किसी उत्तेजना के बीतता रहता, जैसा कि बहुत से जीवनों में भी देखने में आता था, और खेल खत्म हो जाता। यह भी लग सकता है कि क्रिकेट का खेल यथार्थ से कोसों दूर था, तर्कसंगत नहीं था या उसमें वास्तविकता बेहद गड्डमड्ड थी। पर, यही बात जीवन में भी थी। क्रिकेट का विकास ही कुछ इस तरह से हो गया था कि, पुनरावृत्ति के बावजूद यह कहना उचित ही होगा कि न सिर्फ वह जीवन का आईना था बल्कि उसके और जीवन के बीच बेहद तरल और नामालूम सा आवागमन था और जब खेल का यथार्थ उपलब्ध हो जाता था तो ऐसा लगने लगता था कि आगे वह जीवन के यथार्थ की खोज में निकल पड़ा है। क्योंकि, यह मानने के बाद भी कि क्रिकेट का भौतिक, मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक ताम-झाम काफी विशाल था, वह जीवन की विराटता के सम्मुख कुछ भी नहीं था और जिस तरह समुद्र के पानी में नमक की उपस्थिति जानने के लिए उसकी एक बूंद पानी का परीक्षण ही काफी होता है, जीवन में यथार्थ की ठीक-ठीक उपस्थिति समझने के लिए, या कहें, उस पर उंगली रखने के लिए क्रिकेट का उपयोग करना उचित ही था। हालांकि ऐसी किसी संभावना का पता ही किसी को नहीं था, पर कोई बेहतर मस्तिष्क यह काम कर सकता था, जिससे जीवन के दृश्य यथार्थ, लगभग यथार्थ, पूर्ण यथार्थ और अति-यथार्थ का ठीक-ठीक पता चल सके। और यही सब बातें क्रिकेट को एक अलौकिक कलारूप बना देती थीं। हालांकि क्रिकेट की इन सब खूबियों को समझने के लिए गंभीर आध्यात्मिक दृष्टि और दार्शनिक बुद्धि की आवश्यकता थी फिर भी साधारण लोगों के लिए उन्हें कुछ मोटे नियमों में बाँधकर सहज और बोधगम्य बना दिया गया था।
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