Sunday, September 4, 2016

ऑर्थर रैम्बो

ओर्थर रैम्बो का जन्म 1854 में और मृत्यु 1891 में हुई यानी वे सिर्फ 37 साल जिए। 16 साल की उम्र में उन्होंने बाकायदा कविता लिखने का मन बनाया और एक पत्र अपने मित्र को लिखा:
"मैंने अब अपने आपको उच्चकोटि का नीच बनाने का इरादा किया है क्योंकि अब मैं कविता लिखना चाहता हूँ। कोशिश कर रहा हूँ कि अब मैं भविष्यवाणियाँ कर सकूँ। लेकिन तुम नहीं समझोगे और न मैं तुम्हें समझा सकता हूँ। योजना यह है कि मैं अपने उन्माद और बावलेपन में अज्ञात तक पहुँच सकूँ। यह बहुत त्रासदायक काम है लेकिन एक जन्मजात कवि बनने के लिए मुझे मजबूत बनना होगा और धैर्य के साथ इस काम में लग जाना होगा।"
वे एक लंपट और व्यभिचारी के रूप में जाने जाते हैं और कवि पॉल वेरलेन के साथ उनके बड़े घनिष्ठ, रोमानी और हिंसक समलैंगिक संबंध रहे। बीस या इक्कीस साल की उम्र में उन्होंने गुलामों का व्यापार शुरू किया जो एक कवि होते हुए उनके लिए बड़ा मुश्किल काम था। तब बड़ी ईमानदारी के साथ उन्होंने घोषणा की कि वे कविता लिखना छोड़ रहे हैं और उसके बाद जीवन भर कविताएं नहीं लिखीं। बुरा व्यक्ति होते हुए अच्छा कवि कैसे हुआ जा सकता है, उनसे सीखा जा सकता है। एक साथ दोनों आप नहीं हो सकते।
प्रतीकवादी फ्रांसीसी कवियों में उनकी गिनती प्रमुखता से होती है। उनकी एक कविता: (जल्दबाज़ी में किया गया त्रुटिपूर्ण अनुवाद मेरा, इसलिए अंग्रेज़ी भी दे रहा हूँ।)
हर चीज़ देख लेने के बाद...
नज़र हवा में चमक रही है।
सब कुछ पाया जा चुका है...
शाम को, धूप में और हर वक़्त कान पर पड़ने वाली दूर शहर की आवाज़ें।
हर चीज़ जानी जा चुकी हैं...
ओ कोलाहल, ओ नज़र! ये सब जीवन की विश्रामगाहें हैं।
प्यार में वियोग और चमकती आवाज़ें।
(Everything seen...
The vision gleams in every air.
Everything had...
The far sound of cities, in the evening,
In sunlight, and always.
Everything known...
O Tumult! O Visions! These are the stops of life.
Departure in affection, and shining sounds.)
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(येव्तुशेंको की एक छोटी सी टिप्पणी पढ़ने के बाद और विकिपीडिया की मदद लेकर)

Wednesday, August 31, 2016

विडंबना-कथा

दैनिक भास्कर के पिछले पृष्ठ पर आज पाँच मुख्य समाचार हैं जो एक साथ मिलकर एक विडंबना-कथा कहते हैं।
पहला है: औरंगाबाद (महाराष्ट्र) मंडी में एक किसान ने 382 किलो प्याज़ बेचा और जब अपना पैसा लेने गया तो पता चला उल्टे उसे ही 116 रुपए देने होंगे। प्रश्न यह है कि यह किसान वापस लौटकर क्या करेगा। क्या वह किसी से उधार लेकर सरकार के 116 रुपए लौटाएगा? क्या सीधे खेत जाएगा, कुएँ पर पड़ी बाल्टी की रस्सी निकालेगा और कोई बड़ा सा मजबूत वृक्ष ढूंढ़कर फाँसी लगा लेगा? उधार लेकर उधार चुकाने से बेहतर मुझे दूसरा विकल्प लग रहा है तो कृपया आश्चर्य न करें।
दूसरा है, बुद्धदेव जी की पिछली सरकार के विरुद्ध कोर्ट का निर्णय। 2006 में मार्क्सवादी सरकार ने सारे नियम-क़ानूनों को ताक पर रखकर टाटा के लिए किसानों की ज़मीन अधिगृहीत की थी। उसी मार्क्सवादी पार्टी की सरकार ने, जिसने तेलंगाना में आज़ादी के बाद देश के सबसे गौरवशाली जनयुद्ध का नेतृत्व किया था और जो वाकई एक समय मजदूर-किसानों की एकमात्र पार्टी थी। आज अगर इस पार्टी के लोग आदिवासियों के डर से तेलंगाना, छत्तीसगढ़ के जंगलों में घुस नहीं पाते तो क्या आश्चर्य।
तीसरा है, हरियाणा के मुख्यमंत्री का अपने लग्गुओं-भग्गुओं के साथ साइकिल पर विधानसभा पहुँचना। यह कोई आश्चर्य नहीं, बहुत से बड़े नेता ऐसी नाटक-नौटंकी करते रहते हैं। वे सोचते हैं कि ऐसा करने से वे भी माणिक सरकार जैसे दिखाई देने लगेंगे लेकिन साथ में छपे चित्र में ही उनका चेहरा देखकर ज़ाहिर हो जाता है कि वे क्या हैं। आश्चर्य न करें कि वापसी में उनकी साइकिल रिक्शे पर चढ़कर बंगले पहुँचती है। जिप्सी या स्कॉर्पियो में क्यों नहीं जाती यह आश्चर्य है।
चौथा है, "विज्ञापनों से सजेंगे ट्रेन के डिब्बे"। ट्रेनों को ललचाती चीजों के विज्ञापनों से पाट देने की कवायत चल रही है। कहते हैं, ट्रेनों को पेंट करने का खर्च बचेगा और उल्टे रेलवे को 1 से 6 करोड़ प्रति ट्रेन के हिसाब से आमदनी भी होगी। देश में लगभग 20000 ट्रेनें रोज़ चलती हैं। बताइए, व्यापारियों का कितना घाटा होगा! रेल के लिए और देश के लिए उनका यह त्याग देखकर आपको आश्चर्य तो नहीं हो रहा है?
अंतिम है, तेलंगाना सरकार की 500 रुपए में जेल की सैर कराने की योजना। शीर्षक है "500 रुपए में एक दिन जेल के मज़े लो।" भारत की जनता को जेल जाने के लिए पैसे खर्च करने पड़ें, इससे बड़े आश्चर्य की क्या बात होगी।  
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Sunday, August 28, 2016

पवन करण की कविता

भाई
मेरे भाई की नाक एवरेस्ट से ऊंची
चांद से भी अधिक चमकीली
किसी से प्यार करूंगी तो कट जायेगी
अपनी कटी हुई नाक के साथ
मेरा भाई कैसे जियेगा
वह तो मर जायेगा जीते जी
उसकी आंख दूरबीन से तेज
निशाना गुलेल सा सटीक
मैं घने झुरमुट में भी किसी से मिलूंगी
वह देख लेगा, वह वहीं से
खीचकर मारेगा पत्थर
जो ठीक माथे पर लगेगा मेरे
उसके लगते ही
मेरे भाई का माथा हो जायेगा ऊंचा
कोई हाथ, हाथ में लेकर चलूंगी
गुस्से में उसके हाथ मेरी
और उसकी गर्दन मरोड़ देंगे
फैक देंगे किसी नाले में जाकर
कई दिन तक वह अपने
हाथ नहीं धोयेगा, दिखायेगा सबूत
खाप उसके हाथों को चूमेगी
जहां तक घूम सकता वह
घूमेगा छाती फुलाकर अपनी
कलदार सा खनकदार भाई का नाम
मगर वह कब तक काम आयेगा मेरे
प्रेम तो फिर भी रहेगा साथ
प्रेम के बिना मैं कैसे जियुंगी
प्रेम करूंगी तो जाउंगी मारी
पवन करण

उधार का गर्व

महान हिन्दुत्व का 1000 साल का इतिहास युद्ध में हार का और विजेता की नकल का इतिहास रहा है और आज भी इन्हें चैन नहीं है, बेशर्म, उसी राह पर चले जा रहे हैं। इतिहास और वर्तमान से कुछ उदाहरण पेश हैं।
1) भारत में पर्दा-प्रथा कभी नहीं रही। मुसलमानों की नकल पर हिंदुओं ने न सिर्फ औरतों को घर की चारदीवारी में बंद कर दिया बल्कि घूँघट, (तथाकथित) शर्म इत्यादि रिवाजों के द्वारा मुसलमानों के मूर्खतापूर्ण विचारों की नकल करके उनकी तरह खुद भी गौरवान्वित होते रहे।
2) हिंदुओं में कोई ऐसा धर्मग्रंथ नहीं था जिसे पवित्र, अंतिम माना जाए। इतना खुलापन था कि नए विचारों, नई किताबों के लिए जगह थी। कोई किसी को पवित्र मानता था तो कोई किसी दूसरी किताब को। मुसलमानों के प्रभाव में उन्हें भी एक किताब की ज़रूरत पड़ी तो कभी वेदों को तो कभी गीता को हिंदुओं की किताब बताया जाने लगा। गीता पर हाथ रखकर कसमें खिलवाई जाने लगीं जबकि गीता का अर्थ हिंदुओं के लिए वह नहीं है जो मुसलमानों के लिए कुरान का है।
3) जो भारत में पैदा हुआ वही हिन्दू है, ऐसी हिंदुओं की मूल मान्यता है इसलिए न तो कोई इस धर्म को छोड़ सकता है और न कोई दूसरा धर्म बदलकर हिन्दू हो सकता है। इसलिए हिंदुओं में धर्मांतरण की कोई संभावना नहीं है। इस्लाम में उनका धर्म अपना तो सकते हैं, छोड़ नहीं सकते। उनकी नकल पर अब तथाकथित 'घरवापसी' की जा रही है जो असफल होकर रहेगी। हिंदुओं के लिए बेहतर स्ट्रेटेजी यह हो सकती है कि वे मुसलमानों को भी हिन्दू ही मानें लेकिन कट्टरवादियों को मुसलमानों की नकल करके उसी पर गौरवान्वित होना है अतः संभव नहीं लगता।
4) इस्लाम आक्रामक धर्म है और हिन्दू धर्म हर तरह के धर्मों को खुद में समाहित करने वाला धर्म है। अगर इस्लाम तलवार है तो हिन्दू धर्म (वर्तमान अर्थों में हिन्दुत्व नहीं) दलदल है। आज वह इस्लाम की कट्टरता की नकल करना चाहता है अर्थात एक तरह से दूसरों के शस्त्रों से युद्ध करना चाहता है, जिसमें उनकी हार निश्चित है। देख ही रहे हैं।
(नोट: अपन को कोई फर्क नहीं पड़ता, भारत में हिन्दुत्व रहे या इस्लामियत, भाड़ में जाएँ दोनों। हाँ, हम जानते हैं कि यहाँ हिंदुस्तानियों को कोई नहीं मिटा सकता।)

एमिली डिकिन्सन की एक कविता

उधार घृणा करने के लिए मेरे पास वक़्त नहीं था: एमिली डिकिन्सन
घृणा करने के लिए मेरे पास वक़्त नहीं था
क्योंकि मौत हमेशा रास्ता रोक लेती थी
फिर जीवन भी इतना बड़ा नहीं था कि
इतने कम वक्त में दुश्मनी का खात्मा हो पाता

प्रेम के लिए भी मेरे पास वक़्त नहीं था
लेकिन ज़िंदा हैं, तो हाथ पैर तो हिलाने ही होंगे
सोचा, प्रेम के लिए थोड़ा बहुत पसीना बहा लें

एक जीवन में इतना ही कर पाना संभव था

दलित-मुसलमान एका

कुछ लोग दलित और मुसलमान शब्द का इस्तेमाल एक ही साँस में कर जाते हैं जैसे जाति और धर्म एक ही बात हों या दलित और मुसलमान एक ही वर्ग या वर्ण के हों या जैसे मुसलमानों में सभी दलित होते हों या न होते हों । कुछ कट्टरपंथी और अपोलोजेटिक मुसलमान पहले से इस एकता के लड्डू को ताक रहे थे लेकिन इस मकड़जाल में वामपंथियों का फँसना दुर्भाग्यपूर्ण है। बात यह है कि भारतीय समाज बहुत जटिल है और इसमें इस तरह के घपले ऐन मुमकिन हैं। लेकिन इसे समझने की ज़रूरत है, बल्कि इसका पर्दाफाश करने की ज़रूरत है। अपनी गरिमा स्थापित करने के लिए हिन्दू धर्म के भीतर ही दलितों का संघर्ष सैकड़ों सालों से चल रहा है जो उन्नीसवीं सदी में महात्मा फुले, पेरियार अतीत में हम ब्राह्मणों और दलितों का गठबंधन देख चुके हैं। पिछड़ों (यादवों, पटेलों) के साथ भी दलितों का गठबंधन देख चुके हैं। ये सभी जातीय गठबंधन थे और उनमें जटिलताएँ कम थीं फिर भी वे असफल रहे। दलित जातियों में अपने साथी खोज रहे थे जबकि एकता वर्गों की हो सकती है, जातियों की नहीं क्योंकि हितों का जब सवाल आता है तो सामाजिक हितों के साथ आर्थिक हित भी बहुत महत्वपूर्ण होते हैं, बल्कि आर्थिक हित सामाजिक हितों से भी ज़्यादा महत्वपूर्ण होते हैं। तो पिछड़ों में वे अपना वर्ग ही ढूँढ़ रहे थे मगर वह उन्हें नहीं मिला। सामाजिक और आर्थिक रूप से दलित असल में कुछ ज़्यादा ही नीचे थे। इस बीच मुसलमान कभी ब्राह्मणों के साथ तो कभी पिछड़ों के साथ खड़े होते रहे लेकिन उनका अपना कोई स्वतःस्फूर्त संघर्ष नहीं है। इस्लाम में धर्म की आलोचना संभव नहीं है अर्थात न तो मुसलमान शरीया पर प्रश्न उठा सकते हैं, न ही हदीस पर अपना पक्ष रख सकते हैं। कुरान की आलोचना तो बहुत दूर की बात है। गाय के मामले में हिन्दू दलितों को मुसलमानों का समर्थन मिल सकता है मगर सूअर के मामले में नहीं।   
कुछ लोग दलित और मुसलमान शब्द का इस्तेमाल एक ही साँस में कर जाते हैं जैसे जाति और धर्म एक ही बात हों या दलित और मुसलमान एक ही वर्ग या वर्ण के हों या जैसे मुसलमानों में दलित होते ही न हों। कुछ कट्टरपंथी और अपोलोजेटिक मुसलमान पहले से इस एकता के लड्डू को ताक रहे थे लेकिन इस मकड़जाल में वामपंथियों का फँसना दुर्भाग्यपूर्ण है। बात यह है कि भारतीय समाज बहुत जटिल है और इसमें इस तरह के घपले ऐन मुमकिन हैं। लेकिन इसे समझने की ज़रूरत है, बल्कि इसका पर्दाफाश करने की ज़रूरत है। अपनी गरिमा स्थापित करने के लिए हिन्दू धर्म के भीतर ही दलितों का संघर्ष सैकड़ों सालों से चल रहा है जिसे उन्नीसवीं सदी में महात्मा फुले, पेरियार, आदि के सामाजिक आंदोलनों ने असली धार प्रदान की और बाद में अंबेकर और काशीराम ने उसे सत्ता प्राप्ति के राजनैतिक हथियार में बदल दिया। वास्तव में संघर्ष की यह लंबी यात्रा किसी गौरवगाथा से कम नहीं लेकिन अभी भी दलित न तो पूरी तरह मुक्त हुए हैं और न ही उन्हें संपूर्ण सामाजिक और राजनैतिक प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं हुई है। उनका संघर्ष जारी है, बल्कि और तीव्र हुआ है। जातियों में बँटे हुए और भौगोलिक रूप से बिखरे हुए होने के कारण सत्ता में अपना हिस्सा पाने के लिए उन्हें किसी न किसी के साथ गठजोड़ करना ही पड़ता है। अतीत में हम ब्राह्मणों और दलितों का गठबंधन देख चुके हैं। पिछड़ों (यादवों, पटेलों) के साथ भी लंबे समय तक दलितों का गठबंधन रहा है। ये सभी जातीय गठबंधन थे और उनमें जटिलताएँ कम थीं फिर भी वे असफल रहे। दलित जातियों में अपने साथी खोज रहे थे जबकि एकता वर्गों की हो सकती है, जातियों की नहीं क्योंकि हितों का जब सवाल आता है तो सामाजिक हितों के साथ आर्थिक हित भी महत्वपूर्ण होते हैं, बल्कि आर्थिक हित सामाजिक हितों से भी ज़्यादा मानी रखते हैं। तो पिछड़ों में वे अपना वर्ग ही ढूँढ़ रहे थे मगर वह उन्हें नहीं मिला-सामाजिक और आर्थिक रूप से दलित असल में कुछ ज़्यादा ही नीचे थे। इस बीच सभी मुसलमान कभी ब्राह्मणों के साथ तो कभी पिछड़ों के साथ खड़े होते रहे हैं लेकिन दुर्भाग्य से उनका अपना कोई स्वतःस्फूर्त संघर्ष नहीं हैदेखा जाए तो मुसलमानों की उच्च जातियाँ हिन्दू क्षत्रिय और हिन्दू कायस्थ जातियों के साथ सदियों से अच्छे संबंध बनाकर रखती रही हैं और उच्च जातियों के मुसलमानों को हिंदुओं की ऊंची जातियों के साथ गठबंधन करने में कोई विशेष असुविधा नहीं रही है। जिस तरह हिन्दू दलितों को गरीब, जाहिल और सामाजिक रूप से कमजोर बनाए रखा गया उसी तरह मुसलमान दलित भी, जोकि पूर्व में दरअसल हिन्दू दलित ही थे, धर्म के नाम पर अपढ़, गरीब और जाहिल बनाए रखा गया। इस मामले में सामाजिक प्रतिष्ठा और आर्थिक दृष्टिकोण से हिन्दू और मुसलमान दलितों की स्थिति में कोई अंतर नहीं है। दिक्कत यह है कि इस्लाम में धर्म की आलोचना संभव नहीं है अर्थात न तो मुसलमान शरीया पर प्रश्न उठा सकते हैं, न ही हदीस पर अपना पक्ष रख सकते हैं। कुरान की आलोचना तो बहुत दूर की बात है। दुर्भाग्य से उनमें अंबेकर जैसा कोई नेता भी पैदा नहीं हो पाया जो धार्मिक ठेकेदारों के षड़यंत्रों का पर्दाफाश कर सके।
कहने का अर्थ यह कि सभी दलितों का और वर्तमान संदर्भ में हिन्दू और मुसलमान दलितों का एका एक नैसर्गिक बात होगी लेकिन सभी मुसलमानों के साथ दलितों का एका वैसा ही क्षणभंगुर साबित होगा जैसे पहले ब्राह्मण-दलित और पिछड़ा-दलित एका साबित हुआ था। अंततः अवाम की एकता में उनकी आर्थिक स्थिति ही महत्वपूर्ण होती है और मुसलमान दलित जब तक अपने सामंती और धार्मिक ठेकेदारों के चंगुल से मुक्त नहीं होने की कोशिश नहीं करते तब तक यह एका एक असमान और अवसरवादी एका ही कहा जाएगा। इसके अलावा इस एकता से हिन्दू दलित तो लाभ उठा लेंगे लेकिन मुसलमान दलितों की स्थिति में कोई फर्क नहीं पड़ेगा। सत्ता में अगर इस गठबंधन को हिस्सेदारी प्राप्त होती भी है तो हिन्दू दलितों को तो अपना हिस्सा मिल जाएगा लेकिन मुसलमानों के हिस्से में से उनके सामंती और धार्मिक खैरख़्वाह सारा हिस्सा मार लेंगे।    

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Saturday, April 4, 2015

मध्य पूर्व की पहेली और पश्चिमी दुनिया

मध्य पूर्व की पहेली और पश्चिमी दुनिया 

मध्य पूर्व आज की सबसे मज़ेदार पहेली है। पश्चिमी दुनिया रोज़ सबेरे उठकर दिन भर इसका हल खोजती है और रात को थककर सो जाती है, अमरीका तो रात को भी नहीं सोता है, दिन में पहेली का हल खोजने का नाटक करता है और रात में जाग-जागकर इस उधेड़बुन में लग जाता है कि नेशनल इंटरेस्ट में इस पहेली को हल करना ठीक होगा या इसे पहेली ही बना रहने दिया जाए।
तेल के कुओं की बदौलत धर्मगुरु सऊदी शुरू से अमरीका के मित्र था। कुएँ ईरान में भी थे और जब तक वहाँ राजा था, पश्चिमी दुनिया और अमरीका दोनों को साधे रहते और दोनों को दुहते रहते। वैसे भी पश्चिम को पोप और राजा के बीच तालमेल का 1000 साल का अनुभव था। शिया-सुन्नी की यह मामूली पहेली थी और इसे आसानी से हल कर लिया गया था। लेकिन जब ईरान में गलत या सही, जनतंत्र जैसा कुछ हुआ, पश्चिम और अमरीका परेशान हो गए। उसे पता चला कि जनता के भेस में यह तो पोप ही पैदा हो गया है और उसे दो पोपों को साधना है जिससे दोनों को दुहते रहा जा सके। लेकिन दो पोप का कोई precedence इतिहास में नहीं था कि गाइडेंस लिया जा सकेपहेली अब कठिन हो गई थी।
पश्चिमी दुनिया और अमरीका के नेशनल इन्टरेस्ट में अब तीन विकल्प सामने थे: एक-सऊदी पोप के वर्चस्व में दोनों पोपों की दोस्ती करा दी जाए। दो-एक पोप का खात्मा कर दिया जाए। तीन-दोनों पोपों को अलग-अलग क्षेत्रों में अपना काम करने दिया जाए और दोनों को अलग-अलग साधा जाए।
पहला विकल्प तो सिरे से खारिज हो गया। शिया सुन्नी वाली पहेली जितनी आसान लगती थी, उतनी आसान नहीं थी। क्योंकि इस्लाम एक था, लिहाजा पोप भी एक ही हो सकता था। फिर ईरान में जनतंत्र था यानी जनता ही पोप बन गई थी, यह अमरीका के नेशनल इन्टरेस्ट के लिए सबसे बुरी बात थी। सबसे बड़ी बात, सऊदी पोप से उनकी हिमालय से ऊंची और समुद्र से गहरी दोस्ती थी। सो उनके सामने दूसरे विकल्प पर काम करने के अलावा कोई चारा नहीं था-यानी एक पोप का खात्मा कर दिया जाए।
दूसरे विकल्प के अनुसार एक पोप का खात्मा किया जाना था और स्वाभाविक ही ईरान का करना था क्योंकि वह पश्चिम के और अमरीका के यार को हटाकर जनतंत्र बना था। लिहाजा पश्चिम और अमरीका ईरान के दुश्मन हो गए। सबसे बड़ी दिक्कत यह थी कि ईरान एक जनतंत्र थाइतिहास मनुष्य के साथ ऐसे-ऐसे मज़ाक करता रहा है कि अक्सर मनुष्य पागल, मूर्ख नज़र आता है और कई बार इसी पागलपन में वह भेस बदलकर जोकर की तरह अजीबोगरीब हरकतें करने लगता है। तो अक्सर लोग जनतंत्र के एक्स्पोर्टर अमरीका के सऊदी प्रेम और ईरान विरोध को समझ नहीं पाते, उसे पागल या जोकर समझते हैं। लेकिन ईरान परस्त खुश न हों, ईरान खुद भी पिछले चौदह सौ साल से क्रमशः मूर्ख, पागल होते-होते इस बीच जोकर बन चुका है। इस्लाम से पहले ईरान दुनिया के सबसे शक्तिशाली साम्राज्यों में से एक था। हिंदुत्ववादी भारत को रोते हैं लेकिन इस्लाम के आने के बाद ईरान की जितनी छीछलेदर हुई है, उतनी दुनिया में सिर्फ मिस्र की हुई है। उसे पहले रोमन, फिर अरब, फिर तुर्क, फिर मंगोल और पता नहीं किन-किन अज्ञात  और अल्पज्ञात जातियों की मार झेलनी पड़ी और अब ईरान में वास्तविक ईरानी कितने हैं, कहना मुश्किल है। लेकिन जोकर कभी-कभी तुरुप का इक्का भी हो जाता है और इसी इक्के ने यानी ईरानी जनतंत्र ने उसे अपने स्वर्णिम इतिहास की याद दिला दी, वैसे ही जैसे भारतीय हिन्दू अपना स्वर्णिम इतिहास आर्यों में खोज रहे हैं। तो अब उनके लिए सारे पुराने आक्रमणकारी दुश्मन हैं। अरबों ने तो उनका सबसे बड़ा कबाड़ा किया था, लिहाजा वे सबसे बड़े दुश्मन बन गए हैं। अब पश्चिमी दुनिया और अमरीका के दूसरे विकल्प की ओर लौटते हैं और देखते हैं कि यह कितना कठिन है, लगभग असंभव सा। सऊदी पश्चिम के दोस्त हैं लेकिन उसके पिल्ले, यानी अल कायदा, तालिबान, बोको हराम और अब आईएसआईएस उसके दुश्मन। ये पिल्ले ईरान के भी दुश्मन हैं लेकिन ईरान पश्चिम का दुश्मन है। असद बुरा है लेकिन वह आईएसआईएस का दुश्मन है मगर वह ईरान का दोस्त है। इज़राइल सबका दुश्मन है लेकिन ईरान का ज़्यादा, सऊदी का कम। लेकिन आईएसआईएस इज़राइल का ईरान से बड़ा दुश्मन है। उनके लिए वह बिना स्वस्तिक आर्मबैंड के, पगड़ीधारी नाजी ही हैं। कुछ पश्चिमी बुद्धिजीवी मानते हैं कि वास्तव में ईरान के विरुद्ध आईएसआईएस की सहायता की जानी चाहिए। कहने का अर्थ यह कि न तो ईरान को पोप के पद से हटाया जा सकता है न ही उसका खात्मा किया जा सकता है। इस तरह अमरीकी और पश्चिमी दुनिया ईरान से सुलह करने के मूड में आ गई है और इसी में पहेली के तीसरे हल का रहस्य छिपा हुआ है।
और तीसरा विकल्प पहेली का हल नहीं, सिर्फ उसे लंबे समय तक जारी रखने की लंबी चाल है, जिससे लोग भ्रम में बने रहें और पहेली हल करने का मज़ा लेते रहें। दरअसल इसका हल समय के पास है। उसी इतिहास के पास, जिसने हमेशा मनुष्य को मूर्ख, पागल और जोकर बनाया है। यानी जब तक मध्य पूर्व में तेल है, यह पहेली जारी रहेगी और उसके बाद स्वतः हल हो जाएगी। तब तक पश्चिमी दुनिया और अमरीका धार्मिक मुसलमानों के साथ मिलकर इसे इतना कठिन बना देंगे कि ब्रेड और बम में, कैरे और कलाश्निकोव में और राहत कैंप और फौजी अड्डे में फर्क नज़र नहीं आएगा।
सवाल यह है कि उसके नतीजे में मध्य पूर्व का नक्शा क्या होगा। 100 साल बाद की भविष्यवाणी कोई मूर्ख, पागल या जोकर ही करेगा मगर हम ये सब नहीं हैं, इसका हमें कोई गुमान नहीं है। इसलिए ट्राई मारते हैं। तो मेरे मुताबिक, ईरान और टर्की समझ जाएँगे कि पिछले 1400 साल कुल मिलाकर बददुओं की गुलामी की शताब्दियाँ ही थी और वे धर्म के आतंक से उबर लेंगे। अगर ऐसा हो गया तो फिर विश्व राजनीति में ये दोनों देश अपनी पुरानी गरिमा पा लेंगे। बददुओं की हालत बहुत पतली हो सकती है। उनका कुछ बचा रहेगा तो वह मिस्र और पाकिस्तान जैसे देशों में बचा रहेगा अन्यथा वे 1400 साल पहले वाली हालत में चले जाएँगे, जहाँ नखलिस्तान की तरह एकाध दुबई, एकाध कुवैत बचे रहेंगे। भारत दूर है, मगर पाकिस्तान और भारत की हिंदुत्ववादी ताक़तें मिलकर उसे इस पहेली के अलावा कई नई पहेलियों में भी उलझाए रखने में कामयाब होंगे

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